देवशयनी एकादशी का व्रत आज,पढ़िए कथा और जानिए क्या है महत्व

देवशयनी एकादशी का व्रत आज,पढ़िए कथा और जानिए क्या है महत्व

श्री विट्ठल रुक्मिणी स्वरूप श्रृंगार दर्शन

व्रत में सूर्योदय काल का महत्व

देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई को रखा जाएगा। दरअसल, एकादशी तिथि का आरंभ 24 जुलाई को सुबह में 9 बजकर 13 मिनट पर होगा और 25 जुलाई को सुबह में 11 बजकर 35 मिनट पर तिथि समाप्त होगी। देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई को रखा जाएगा क्योंकि, इस दिन उदय काल के समय एकादशी तिथि रहेगी। शास्त्रों में एकादशी तिथि का व्रत तभी करना उत्तम माना गया है जब वह सूर्योदय काल के दौरान हो। एकादशी व्रत का पारण 26 जुलाई को सुबह में 9 बजकर 30 मिनट पर करना उत्तम रहेगा।

देवशयनी एकादशी व्रत का महत्व

देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी के नाम भी जाना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत करने से पापों का क्षय होता है। बता दें कि इस व्रत को करने से अनेक यज्ञों और तीर्थयात्राओं के समान फल प्राप्त होता है। साथ ही इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करने से भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती हैं। इसके अलावा इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ भी कर सकते हैं। इस दिन से ही चातुर्मास का आरंभ हो जाता है। जिस दौरान जप तप और सात्विक भोजन करना चाहिए।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

इस व्रत से भगवान विष्णु लक्ष्मी सहीत प्रसन्न होते हैं इसका नाम पद्मा एकादशी, देवशयनी, महाएकादशी, थोली एकादशी, हरिशयनी एकादशी, पद्मनाभा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी, देवपोढ़ी एकादशी भी कहा जाता है; ईसकी पौराणिक कथा इस प्रकार है----
सतयुग काल में सूर्यवंशी मांधाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यवादी, धर्मनिष्ठ और महाप्रतापी थे जो अपनी प्रजा का पुत्र की भांति पालन करते थे उनकी सारी प्रजा धनधान्य से भरपूर और सुखी थी उस राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था।
कालांतर में राजा के राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई और अकाल पड़ गया प्रजा अन्न की कमी के कारण अत्यंत दुखी हो गई अन्न आदी के न होने से राज्य में यज्ञादि वैदिक अनुष्ठान भी बंद हो गए, एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर कहने लगी कि हे राजन! सारी प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार रही है, चुंकी समस्त विश्व की सृष्टि का कारण वर्षा है एवं वर्षा के अभाव से अकाल पड़ गया है और अकाल से प्रजा मर रही है इसलिए कोई ऐसा उपाय  करें जिससे प्रजा का कष्ट दूर हो।
राजा मांधाता कहने लगे कि आप लोग ठीक कह रहे हैं, वर्षा से ही अन्न उत्पन्न होता है और आप लोग वर्षा न होने से अत्यंत दुखी हो गए हैं मैं आप लोगों के दुखों से चिंतित था और निश्चय ही कोई उपाय करूंगा, ऐसा कहकर राजा कुछ सेना साथ लेकर वन की ओर गए वहाँ अनेक ऋषियों के आश्रम में भ्रमण करते हुवें अंत में ब्रह्मापुत्र श्री अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे और अंगिरा ऋषि को प्रणाम किया मुनि ने राजा को आशीर्वाद देकर आश्रम में आने का कारण पूछा राजा ने हाथ जोड़कर विनीत भाव से कहा :- हे ऋषिवर! सब प्रकार से धर्म पालन करने पर भी मेरे राज्य में अकाल पड़ गया है इससे प्रजा अत्यंत दुखी है! राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट होता है, ऐसा शास्त्रों में कहा है जब मैं धर्मानुसार राज्य करता हूं तो मेरे राज्य में अकाल कैसे पड़ गया ?
इसके कारण का पता मुझको अभी तक नहीं चल सका अब मैं आपके पास इसी संदेह की निवृत्ति हेतु आया हूं, कृपा करके मेरे इस संदेह को दूर कीजिए साथ ही प्रजा के कष्ट को दूर करने का कोई उपाय बताइए! इतनी बात सुनकर ऋषि ने कहा:- हे राजन! यह सतयुग सब युगों में उत्तम है इसमें धर्म के चारों चरण सम्मिलित हैं अर्थात इस युग में धर्म की सबसे अधिक उन्नति है लोग ब्रह्म की उपासना करते हैं और केवल सद्ब्राह्मणों को ही वेद पढ़ने का अधिकार है सद्ब्राह्मण ही तपस्या करने का अधिकार रख सकते हैं, परंतु आपके राज्य में एक अधमी कर्मों से शूद्र अपने पापकर्मो की शुद्धी हेतु तपस्या कर रहा है इसी दोष के कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है, इसलिए यदि आप प्रजा का भला चाहते हो तो उस शूद्र का वध कर दो!
इस पर राजा कहने लगे:- हे महात्मन! मैं उस निरपराध तपस्वी शूद्र को कैसे मार सकता हूं ? आप इस दोष से छूटने का कोई दूसरा उपाय बताइए तब ऋषि ने कहा :- हे राजन! यदि तुम अन्य उपाय चाहते हो तो आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा नाम की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी और प्रजा सुख प्राप्त करेगी क्योंकि इस एकादशी का व्रत सब सिद्धियों का प्रदाता है और समस्त उपद्रवों को नाश कर मनोवांछित फल देता हैं; अतः इस एकादशी का व्रत तुम प्रजा, सेवक तथा मंत्रियों सहित करो।
मुनि के वचनों को सुनकर राजा अपने नगर आयें और चारो वर्णो के साथ चर्चा कर विधिपूर्वक पद्मा एकादशी का व्रत किया उस व्रत के प्रभाव व श्रीहरी के आशीष से वर्षा हुई और प्रजा को सुख प्राप्त हुआ और अंत मे सभी प्राणियों को सद्गति मिली! अत: इस एकादशी का व्रत सब मनुष्यों को करना चाहिए यह व्रत इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति को देने वाला है इस कथा को पढ़ने और सुनने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं!
ईस एकादशी में भगवान विष्णु चार माह के लिये योगनिद्रा मे चले जाते हैं एवं चौमासे(चातुर्मास) का प्रारंभ हो जाता है, जो प्रबोधिनी एकादशी तक रहता है।

स्वच्छ ह्रदय से बोलिये श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की जय 

विशेष:
॰आज व्रत करने से जाने-अनजाने में किए गये पापकर्म से मुक्ति मिलती है.
॰इस व्रत से स्वस्थ मनोकामना पूर्ति व मोक्ष की प्राप्ति होती हैं.
॰यदि व्रत ना हो पायें तो चाँवल ना खायें एवं समीप के मंदिर में आरती के समय अवश्य जायें.